गले में इन्फेक्शन के लक्षण

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दोस्तों ये लेख गले के संक्रमण,उनसे बचाव एवं उपचार  से सम्बंधित है | वैसे तो इंटरनेट पर गले के संक्रमण से सम्बन्ध  रखने वाले हज़ारो पोस्ट मिल जायेंगे, परन्तु इस  पोस्ट को  अपने आप में बिलकुल अलग अलग बनाने की कोशिश हमने किया है | जिसकी दो वजह है पहली वजह यह है की यह लेख केवल रोगी व्यक्ति को ही नही बल्कि सभी छात्रों के लिए भी बहुत उपयोगी साबित होगी इस पोस्ट में हम केवल संक्रमण पे ही सिमित न रहकर ,संक्रमण की कारणों के बारे में भी जानकारी उपलब्ध करवा रहे हैं जैसे संक्रमण क्यों होता हैं ,वायरस बैक्टीरिया क्या हैं |

दूसरी वजह यह हैं की  संक्रमण से सम्बंधित ज्यादातर लेखों में जानकारिया किलिष्ट  भाषा में दी गयी हैं, इन जानकारियों को पढ़ना तो आसान है परन्तु समझना उतना ही कठिन है| अतः मैंने सभी जानकारियों को आसान शब्दों   में लिखने के साथ साथ सभी सम्बंधित शब्दों को english तथा हिंदी दोनों भाषाओ में लिखने का प्रयास किया है |
 आप  सभी से ये मेरा निवेदन है की आप इन जानकारियों का सदुउपयोग करे साथ ही साथ   जानकारियों  को आगे शेयर करके लोगो को गंभीर  तरह से संक्रमित होने से बचाये| ,छात्रों को परीक्षा में सफल होने में सहायक की भूमिका अदा करे |
यदि आप हमारे द्वारा दी गयी जानकारियों  में से किसी जानकारी को नही समझ पा रहे है तोआप कमेंट बॉक्स के माध्यम से हमसे संपर्क स्थापित करे अथवा हमे इंस्टाग्राम पे फॉलो करे ,हमारी ईद की लिंक आपको इस लेख के ऊपर मेरी पिक पे क्लिक करने के बाद मिल जाएगी ,  हम जल्द से जल्द आपकी सहायता के लिए उपलब्ध होंगे |
यह लेख गले के संक्रमण सम्बंधित रोगों  से  सम्बंधित हैं  परन्तु अधूरी जानकारी हमेशा खतरनाक होती हैं । इसलिए
सबसे पहले हम यह जानने का प्रयास करेंगे की मानव  रोग ,बीमारी अथवा DISEASES होते क्या हैं तथा ये रोग हमे किन कारणों से होते हैं
रोग(diseases ) – रोग का शाब्दिक  अर्थ होता हैं रुकावट या बाधा अर्थार्त अच्छे  स्वास्थ में रुकावट या बाधा उत्त्पन्न होना जिससे हम खुद को असहज महसूस करने लगे।
रोग के प्रकार : –
रोग को लक्षणों एवं कारणों के आधार पर दो भागों में बता गया हैं
(1 ) जन्मजात रोग (congenital diseases ) – वैसे रोग जो जन्म के समय से ही शरीर में पाए जाते हैं ,ऐसे रोग गर्भावस्था में अनियमित विकाश,अनुवांशिक अनियमततता ,शारीरिक अंगो के ठीक से काम न कर पाने  आदि  कारणों से होते हैं।
जैसे -patau ‘ syndrome  (इस रोग में बच्चो का ऊपरी  ओठ बिच से काट के दो टूड़को में बाटे होते हैं ,इस रोग में कुछ बच्चे नेत्र रोग से पीड़ित एवं मंद बुद्धि भी हो सकते हैं।
(2 ) उपार्जित रोग अथवा अर्जित रोग (acquired diseases )- ये रोग जन्म के बाद बिभिन्न कारणों से होते हैं जैसे – virus  (विषाणु ,बैक्टीरिया( जीवाणु ),कवक (fungus )  एवं प्रोटोजोआ (protozoa )  इत्यादि।
उपार्जित रोग( acquired  diseases )अथवा अर्जित रोग 2 प्रकार के होते हैं -।
(1 ) असंक्रामक रोग अथवा असंचरणीय रोग (non -communicable  diseases ) -वैसे रोग जो रोगी व्यक्ति के समपर्क में आने मात्र से नही फैलते,उद्धारहण स्वरूप आप किसी ह्रदय रोगी से मिलने के बाद आप स्वयं ह्रदय रोगी नही हो जाते हैं या फिर किसी जोड़ो के दर्द  से ग्रषित रोगी से मिलने के बाद आपके जोड़ो में दर्द नही शुरू हो जाता क्योकि इसका एकमात्र  कारण यह  हैं की हृदय रोग,जोड़ो का दर्द इत्यादि रोग संक्रामक नही हैं।इसी प्रकार मधुमेह(शुगर ) कैंसर जैसे घातक रोग भी असंक्रामक रोगो की श्रेणी में आते हैं।
(2)संसर्गी (एक दूसरे के संपर्क में आना ) रोग अथवा संक्रामक रोग अथवा संचरणीय रोग (communicable  diseases )  – वैसे रोग जो रोगी व्यक्ति के संपर्क में आने से स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित हो जाए वो संक्रामक रोग कहलाते हैं एवं रोग से ग्रषित व्यक्ति संक्रमित व्यक्ति कहलाते हैं जैसे – कोरोना  इसके अलावा संक्रामक रोग होने की और भी बहुत वजह होती हैं
  जैसे –  वायु संचरण ,दूषित जल या भोजन ,रोग वाहक कीट (जैसे मच्छर )
उद्धाहरणस्वरुप – कोरोना ,गले का संक्रमण,हैज़ा  ,डेंगू,स्वाइन फ्लू ,मलेरिआ हेपेटाइटिस A  B  C  D  एवं E ,चेचक ,प्लेग ,टेटनस, TB ,इत्यादि
आज हमारा  लक्ष्य  केवल गले में संक्रमण के बारे में  जानकारी उपलब्ध करवाना हैं इसलिए बाकि के रोगों पे चर्चा हम किसी और कंटेंट पे करेंगे आप हमारे साथ जुड़े रहिये और हमारे वेबसाइट के नोटिफिकेशन को ऑन रखिये।
संक्रमण की मुख्या 2 वजह है वायरस एवं बैक्टीरिया तो आइये सबसे पहले हम जानते है की ये वायरस और बैक्टीरिया किस चिड़िया का नाम हैं |

तो सबसे पहले हम वायरस के बारे में चर्चा करेंगे –

बैक्टीरिया एवं वायरस माइक्रो ऑर्गनिज़म अर्तार्थ   सूक्षमजीव (अतयंत छोटे जीव जिन्हे हम नंगी आखो से नही देख सकते ,इन जीवो को देखने हेतु हमे इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी का उपयोग करना पड़ता है। ) होते है। इन जीवो का उपयोग खमीर ईस्ट  बनाने ,दवा उद्योग जैली बनाने ,एवं दही बनाने इत्यादि में करते है


वायरस – वायरस का शाब्दिक अर्थ विष होता हैं
1892 AD में रूस के वैज्ञानिक दमित्री इवानोवोस्की(IVANOVSKY )  तम्बाकू की पत्ती में मोज़ैक रोग ढूंढने के समय किया और बताया की एक विशेष प्रकार के वायरस की वजह से मौजेक रोग होता हैं।
परन्तु वायरस का नाम  ‘वायरस’ तथा वायरस के प्रकीर्ति को सर्वप्रथम  बेइजेर्निक्क ने बताया था।
वायरस की संरचना -वायरस एक नूक्लिक अम्ल( यह वायरस का संक्रामक हिस्सा कहलाता हैं ) होता है जो प्रोटीन से घिरा होता हैं ,प्रोटीन के इस आवरण को कैप्सिड (capsid ) कहते हैं। न्यूक्लिक अम्ल हमारे भोजन में पोषक पदार्थ के रूप में भी पाए जाते हैं।
यहाँ एक शब्द है न्यूक्लिक अम्ल तो आइये जानते हैं की यह न्यूक्लिक अम्ल क्या होता हैं तो  नूक्लिक अम्ल वो यौगिक हैं जो अनुवांशिक (GENETIC ) सूचनाओं को पहुंचाने का काम करते हैं तथा प्रोटीन निर्माण में सहायक होते हैं तथा यह कोशिकाओं का ढांचा भी बनाते हैं |
न्यूक्लिक अम्ल 2 प्रकार के होते हैं
(1 ) DNA  ( DEOXYRIBONUCLEIC  ACID  ) डी ऑक्सी राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल- इसका मुख्य कार्य
अनुवांशिक (GENETIC ) लक्षणों ( माता पिता के लक्षणों) को एक पीढ़ी(GENERATION ) से दूसरे पीढ़ी तक ले जाना होता हैं।
(2 ) RNA (RIBONUCLEIC ACID )   राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल – इसका कार्य कोशिकाओं (CELL ) में प्रोट्रीन के  निर्माण  में सहायता करना होता हैं।
*न्यूक्लिक अम्ल की खोज फीड्रिक माईखर (FEIDRICH MEISCHER ) ने किया था,जिस प्रकार बालू (SAND ) मिलकर  ईट का निर्माण करते हैं उसी प्रकार  न्यूक्लिक अम्ल का निर्माण हज़ारो न्यूक्लिओटाईडस   ( NUCLIOTIDES ) के मिलने से होता हैं   ,न्यूक्लिओटाइडस का निर्माण  पेंटोज शर्करा (PENTOSE SUGAR   ) ,( PENTOSE शुगर वैसे शुगर को कहते है जिनके पास 5  कार्बन हो तथा इसका दूसरा नाम राइबोज़ होता हैं   )  ,क्षार (BASE ) एवं फास्फेट समूह (POSPHATE  GROUP ) से मिलकर बना होता हैं।
तो आइये अब वायरस पर वापस चलते हैं |
वायरस तीन प्रकार के होते हैं (1 ) पादप विषाणु( plant VIRUS )- इनमे नूक्लिक अम्ल RNA होता हैं।
                                        (2 ) जंतु विषाणु (animal  VIRUS )- इनमे  नूक्लिक अम्ल या तो RNA  या तो DNA होता हैं।
                                        (3 ) बैक्टेरिओफेज  या जीवाणुभोजी (bacteriophage ) – इनमे नूक्लिक अम्ल के रूप में DNA पाया जाता हैं| वैसे वायरस जो जीवाणुओं को खा जाते हैं उन्हें बैक्टेरिओफेज( bacteriophage , BACTERIA -जीवाणु phage – to eat ) वायरस कहते हैं bacteriophage के कारण ही नदियों का पानी शुद्ध होता हैं।
इस वायरस की खोज रूस के  फेलिक्स herelle और ब्रिटेन के  फ्रेडरिक   twort  ने किया था।
वायरस की प्रकीर्ति –
विषाणु अति सुक्ष्म परजीवी एवं अकोशिकीय (acellular) जीव होते हैं ,जिन्हे केवल इलेक्ट्रान सूक्षम दर्शी से ही देखा जा सकता हैं। वायरस बातावरण में मृत अवस्था में पाए जाते हैं परन्तु यही  विषाणु किसी जीवित  परपोषी के अंदर जा कर जीवित हो जाते हैं एवं   गुणन जनन ( MULTIPLICATION  REPRODUCTION )( 1 वायरस  से 2 वायरस का जन्म फिर उसी 2 वायरस  से 4  का  , 4  से 16  का   ,16  से 256  का जन्म   होना  )  परन्तु यही वायरस जब जीवित परपोषी का शरीर छोड़ बाहर खुले बातावरण में आते है तो इनका जीवन 2 -4  घंटे में भी समाप्त हो सकता हैं |
करते हैं।
वैज्ञानिको में वायरस के संजीव अथवा निर्जीव होने में मुद्दे पर अभी भी मतभेद हैं ।

चुकी वायरस मृत  एवं जीवित ( जब यह जीवित शरीर में होते हैं तो यह जीवित होते हैं एवं जनन क्रिया करते हैं )दोनों अवस्थाओं  में पाए  जाता है इसलिए हम वायरस को सजीव एवं निर्जीव  के बिच की कड़ी कहते हैं।


बैक्टीरिया – यदि मैं आपसे यह सवाल करू की धरती पर पहला जीव कौन हैं या फिर  मैं आपसे यह सवाल करू की धरती पर धरती के आखिर तक रहने वाला अंतिम जीव कौन सा होगा तो आप मेरा यकीन कीजिये दोनों  का जवाब  एक ही होगा और वह जवाब है बैक्टीरिया | तो आइये जानते है आखिर यह बैक्टीरिया है क्या हैं | बैक्टीरिया(जीवाणु)  वायरस (विषाणु) के बाद सबसे छोटा सूक्ष्मजीव (tiny animalcules, माइक्रो  ऑर्गनिज़म) हैं|  बैक्टीरिया की खोज 1683  AD में एंटोनी वॉन लूवेन्हॉक  (antony  von  leeuwenhock  ) ने किया ,एंटोनी वॉन लियूवेंनहॉक हॉलैंड के निवासी थे जिन्होंने खुद से बनाए गए सूक्ष्मदर्शी द्वारा सर्वप्रथम मनुष्यों के दातों के खुरचन में इन्हे देखा ,लीयूवेंहॉक ने इन जीवाणुओं को सूक्ष्मजीव कहकर संबोधित किया  इन सूक्ष्मजीवों का नामकरण आगे चलकर 1829Ad में एहरेनबर्ग(aranberge ) ने बैक्टीरिया किया | यह एककोशिकीय जीव होते है( मानव बहुकोशिकीय जीव ही ,मानव का शरीर लगभग 60 -90 ट्रिलियन कोशिकाओं का बना होता हैं। सबसे छोटा  बैक्टीरिया मैकोप्लास्म 0.1  माइक्रो मीटर एवं सबसे बड़ा बैक्टीरिया  इपुलोपीसियम  फेशल्सोनि 600  माइक्रो मीटर के होते हैं। बैक्टीरिया सभी स्थानों पे पाए जाते है। चाहे वो स्थान अत्यधिक ठंडी अथवा अत्यधिक गर्म क्यों न हो ,ये धरती के ऊपर धरती के अंदर ,मिटटी मे यहाँ तक की  ये हमारे भोजन ,जल,वायु  मे भी पाए जाते है। इन्ही कारणों से  यह सबसे अधिक तरह से अपने जीवन के साथ रहने वाला जीव कहा जाता है |

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 बैक्टीरिया की विशेषताएं :-
कुछ बैक्टीरिया  ऑक्सीज़न की उपस्थिति और कुछ बैक्टीरिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में भी रह सकते है
वैसे  बैक्टीरिया जो  ऑक्सीजन की उपस्थिति में आते ही मर जाते हैं उन्हें बिक्षोभ बैक्टीरिया कहते हैं
तथा  वैसे  बैक्टीरिया जो  ऑक्सीजन की उपस्थिति में आकर भी जीवित रहते हैं उन्हें संकाय बैक्टीरिआ कहते हैं।
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बैक्टीरिया का वर्गीकरण :-
पोषण के आधार पर
  (A) स्वपोषी(AUTOTROPHIC )- अपना भोजन स्वयं बनाने वाले।
  (B) रसायन संश्लेषी(chemosynthetic )- अकार्बनिक पदार्थो (वैसे पदार्थ जिनमे कार्बन एटम नही पाए जाते हैं ) के  ऑक्सीकरण ( ऑक्सीज़न का सहयोग अथवा हाइड्रोजन को मुक्त करना ) से  ऊर्जा प्राप्त करने वाले।
  (C)  प्रकाश संश्लेषी (photosynthetic )  – प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करकर अपना भोजन बनाने वाले।
  (D) परजीवी (PARASITIC )-ये बैक्टीरिया अनेक रोगो के कारण होते हैं और ये  दूसरे जीवो के ऊपर आश्रित होते हैं।
  (E) मृतोपजीवी (SAPROPHYTIC ) – ये मृत शरीर से भोजन प्राप्त करते हैं।
  (F) सहजीवी (SYMBIOTIC ) – ये दूसरे जीवो के शरीर में रह कर भोजन  प्राप्त करते हैं परन्तु उस जीव को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचते हैं।
  (G)  प्रकाश संश्लेषी (photosynthetic )  – प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करकर अपना भोजन बनाने वाले।
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आकृति के आधार पर बैक्टीरिया का वर्गीकरण :-
(1 ) bacillus (शालकवत)-छड़ नुमा की अकीर्ति वाले बैक्टीरिया |
(2 )coccus (गोलाकार )- गोला(sphere ) की आकृति वाले बैक्टीरिया | गोलाकार बैक्टीरिया के 3  प्रकार होते हैं |
     (A ) micrococci ( माइक्रो कोकई )- cocus(कोकस) cocci (कोकाई)  का बहुवचन(plural ) शब्द हैं |एक गोलाकार बैक्टीरिया को micrococi   ( माइक्रो कोकई ) कहते हैं |
     (B )diplococci (डिप्लोकोकाई) – diplo (डिप्लो)/डाई  का अर्थ ही 2  होता हैं ,ये बैक्टीरिया 2 -2 गोलाकार बैक्टेरियों   के समूह में होते हैं
     (C )streptococci (स्ट्रेप्टोकोकाई) -अनेको गोलाकार बैक्टीरिया के चैन रुपी समूह को streptococci (स्ट्रेप्टोकोकाई) बैक्टीरिया कहते हैं |
     (D )sarcinae (सारसिनी)-गोलाकार बैक्टीरिया 8  ,64  या 128  के क्यूबिक (घनाकृत ) रूप मेंजुड़े होते हैं |
(3 )  comma (कोमा ) या vibrios  (विब्रिओस) – इंग्लिश के चिन्ह  कोमा (,) की आकृति वाले |

(4) spiralli  (सर्पिलाकार ) – ये बैक्टीरिया सर्पिलाकार होते हैं

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